राजेंद्र वर्मा की गज़लें
एक
चंदनी चरित्र हो गया,
मैं सभी का मित्र हो गया।
ज़िन्दगी संवर गयी मेरी,
फूल से मैं इत्र हो गया।
रश्मियों के नैन हैं सजल,
इन्द्रधनु सचित्र हो गया ।
आदमी करे तो क्या करे,
वक़्त ही विचित्र हो गया।
कामना की पूर्ति हो गयी,
मन मेरा पवित्र हो गया।
आत्मा विदेह हो गयी,
पंचतत्व चित्र हो गया.
दो
मेरा अनाdi काल से कण-कण में वास है,
पर दृश्यमान हूँ उसे जिसमे उजास है।
यद्यपि समुद्र और बूँद हैं पृथक-पृथक,
फिर भी समुद्र बूँद में करता प्रवास है।
मेरी सदैव दैन्य से प्रगाढ़ता रही,
स्वर्गिक विलासिता मुझे आती न रास है।
तू जिस अनाम के लिए व्याकुल रहा सदैव,
तुझमे ही बैठा ले रहा वो उच्छ्वास है।
स्वीकारता है क्यों तू परिस्थिति की दस्ता,
जब मुक्ति का उपाय भी तेरे ही पास है।
तेरे तो हाथ कर्म है, परिणाम तो नहीं,
जो होना था सो हो गया, फिर क्यों u
Sunday, September 11, 2011
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